रिसर्च एंड डेवलपमेंट योजना’ के तहत सेंटर ऑफ एक्सीलेंस गठन हेतु विशेषज्ञ समितियां गठित
लखनऊ 6 फरवरी। उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संस्कृत भाषा के देश के जाने-माने विद्वान प्रोफेसर (डॉ०) अशोक कुमार दुबे, आचार्य, संस्कृत विभाग, बीएसएनवी पी०जी० कॉलेज (लखनऊ विश्वविद्यालय), लखनऊ को उत्तर प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों, राजकीय महाविद्यालयों तथा अनुदानित महाविद्यालयों के शिक्षकों द्वारा विशिष्ट क्षेत्रों में किए जा रहे उत्कृष्ट शोध कार्यों के लिए संचालित ‘रिसर्च एंड डेवलपमेंट योजना’ के परीक्षण हेतु गठित विशेषज्ञ समितियों का सदस्य नामित किया गया है।
यह विशेषज्ञ समितियां प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालयों के विभिन्न विभागों को ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के रूप में विकसित किए जाने के उद्देश्य से गठित की गई हैं, जो शोध की गुणवत्ता, उपयोगिता और नवाचार को परखेंगी।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सतत, समर्पित एवं विशिष्ट सेवा देने के कारण प्रोफेसर (डॉ०) अशोक कुमार दुबे को राज्य सरकार, केंद्र सरकार एवं विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान, मदन मोहन मालवीय विश्वविद्यालय स्तरीय सम्मान, संस्कृत भूषण सम्मान, द ग्रेट सन ऑफ इंडिया सम्मान, सोमनाथ गोल्ड मेडल अवार्ड, उत्कृष्ट लेखन सम्मान, राष्ट्र गौरव सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित अलंकरण प्राप्त हो चुके हैं। उच्च शिक्षा एवं संस्कृत अध्ययन के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायी माना जाता है।
प्रोफेसर (डॉ०) अशोक कुमार दुबे के अलावा जिन अन्य पांच शिक्षाविदों को विशेषज्ञ समिति का सदस्य नामित किया गया है, उनमें प्रोफेसर उमा श्रीवास्तव (सांख्यिकी विभाग), प्रोफेसर विनय कुमार सिंह (जंतु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग), दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर, प्रोफेसर राजशरण शाही (शिक्षाशास्त्र विभाग), बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ, प्रोफेसर राजेश कुमार तिवारी (अर्थशास्त्र विभाग), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी तथा प्रोफेसर मंजुला उपाध्याय (अर्थशास्त्र विभाग), नवयुग महाविद्यालय, लखनऊ शामिल हैं।
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों ने इस निर्णय को प्रदेश में शोध संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक पहल बताया है, जिससे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शोध को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
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